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"जो स्वयं को और विश्व को नित्य अंतर्मुख भाव से देखते हैं तथा अपने भीतर होने वाले सभी परिवर्तनों की कार्य–कारण व्यवस्था को जान लेते हैं, जो सदा चेतनशीलता की ओर ही अभिमुख रहते हैं, उनका मैं मित्ररूप से “सांगाति” होता हूँ—ऐसा स्वयं सर्वसुखधाम भगवंत कहते हैं।"

– श्रीसंत बाबामहाराज आर्वीकर (मराठी से अनुवादित)

चंद्रमे जे अलांछन । मार्तंड जे तापहीन ।
 
इन श्री ज्ञानेश्वर द्वारा कथित संतत्वका श्रीबाबा के भीतर नित्य जाग्रत था। महाराष्ट्र-भूमंडल में एक नवीन धर्म-जागरण की प्रार्थना प्रभात उनके द्वारा पूर्व दिशा की ओर अरुण वर्णांकित सुचिह्नों से मंडित हुई है। उनके ग्रंथ दिव्यामृतधारा में निहित अमृतधाराओं के वर्षाव से शताब्दियों-शताब्दियों तक श्रद्धाशील साधक-वर्ग स्नात होकर अपने-अपने अंग-दोषों की सहज निवृत्ति तथा श्रीगुरु-चरणों की मधुर आरती साधता रहेगा।

- प.पू श्री वामनराव गुळवणी महाराज

(मराठी से अनुवादित)

संत श्री बाबामहाराज आर्वीकर

पू. बाबा का रूपदर्शन अत्यंत मनोहर था। काले, कोमल केश—गर्दन से कंधों तक पहुँचने वाले—पीछे की ओर सँवारे हुए, स्वच्छ और सुसज्जित रहते थे। ललाट चौड़ा, नाक सुदृढ़, मूँछें और दाढ़ी सलीके से बढ़ाई हुई थीं। मुख-मुद्रा गंभीर और चिंतनशील होते हुए भी सदा हास्यभाव से अभिमुख रहती थी। स्वर मृदु होते हुए भी घन था; नेत्र विशाल और सर्वार्थ से आकर्षक थे।

 

शरीर-रचना ऊँची और सुदृढ़ थी। श्वेत, शुभ्र लुंगी और उसी प्रकार का शुभ्र, मुलायम और चकदार कुर्ता वे धारण करते थे। कभी-कभी हरमूंजी मोतिया रंग का वस्त्र पू. बाबा सिर पर बाँधते थे। वर्तमान में रहते हुए भी बीच-बीच में जैसे कहीं और होकर आ जाते हों—ऐसा आत्मतंद्रा-भाव अनुभव में आता था।

 

कृपालुता, क्षमाशीलता, करुणा और प्रसंगानुसार कठोरता—ऐसे अनेक गुण-विशेष पू. बाबा के सान्निध्य में अनुभव होते थे। हम किसी से भिन्न हैं—संत, महात्मा, महाराज, गुरु—ऐसा कोई भी विशेषत्व पू. बाबा के विहार में नहीं था। परिवार और समाज में परस्पर जैसी व्यवहार-रीति होनी चाहिए, वैसा ही उनका व्यवहार रहता था। किसी के घर जाने पर वहाँ जैसी व्यवस्था होती, उसी में वे सहज समरस हो जाते। समृद्ध परिवार के मधुर पदार्थ जैसे वे ग्रहण करते, वैसे ही किसी निर्धन के घर यदि बासी अन्न शेष हो, तो बिना किसी के कहे स्वयं ढूँढ़कर निकालते और सबके साथ स्वयं भी खाते। अपेक्षारहित जीवन कैसा होना चाहिए—यह उनके रूप और आचरण से साक्षात् प्रकट होता था।

संत बाबा के जीवन को संक्षेप में दिखाने वाली एक छोटी फिल्म देखें...

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प. पू. बाबामहाराज आर्वीकर की अलौकिक ग्रंथसंपदा…

संत बाबा के ग्रंथों के बारे में और जानने के लिए एक छोटा वीडियो (मराठी में) देखें।

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