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साधक! अवधान दीजिए!!

आध्यात्मिक कार्य और साधना करने वाले साधक को कैसा होना चाहिए — इस विषय में पू. बाबा का मार्गदर्शन।

अपनी आवश्यकताओं को यथासंभव कम करें।

परिस्थितियों के साथ स्वयं को सामंजस्य में रखें।

किसी भी वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर न रहें।

आपके पास जो कुछ है, उसे दूसरों के साथ समान रूप से बाँटें।

दूसरों की सेवा के लिए सदा तत्पर रहें। आत्मभाव से सेवा करने का एक भी अवसर न चूकें।

अकर्ताभाव और आत्मभाव में ही मन को रमाएँ।

कम और मधुर शब्द बोलें।

ईश्वर को समझने की प्रज्वलित इच्छा मन में बनाए रखें।

अपनी स्वामित्व-भावना को भूलकर ईश्वर की शरण जाएँ।

१०

ईश्वर को शरण जाने के लिए गुरु की अत्यंत आवश्यकता होती है।

११

अत्यधिक शांति और दृढ़ता धारण करें।

१२

अभ्यास एक भी दिन न छोड़ें।

१३

मार्ग पर स्वयं ही चलना होगा; गुरु केवल मार्ग दिखाएँगे।

१४

जीवन बहुत अल्प है। मृत्यु कब आएगी—इसका कोई निश्चित समय नहीं। योग-साधना का गहन अभ्यास करें।

१५

अपने नैतिक और आत्मिक विकास की दैनिक रोजनिशी रखें, और उसमें प्रतिदिन की प्रगति अथवा त्रुटियों की सत्यतापूर्वक नोंद करते रहें।

१६

यह कहकर शिकायत न करें कि साधना के लिए समय नहीं मिलता। नींद और अत्यधिक बोलना कम करें। सदा ब्रह्ममुहूर्त में ही साधना करें।

१७

मन में ईश्वर या ‘सत्य’ के विचार दृढ़ कर संसार को विस्मृत करें।

१८

आप कोई विशेष व्यक्ति हैं—यह भूल जाएँ। इसी प्रकार आप पुरुष हैं या स्त्री—इन बातों को भी दृढ़ ब्रह्मचिंतन द्वारा विस्मृत करें।

१९

जो कार्य आज करना संभव हो, उसे कल पर न टालें।

२०

अपने कर्तृत्व और पात्रता पर गर्व करके उसका प्रदर्शन न करें। सदा सरल और शांत रहें।

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