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श्री स्वामी समर्थ

“अनंत कोटि ब्रह्मांडनायक” यह उपाधि श्री अक्कलकोट स्वामीं को प्राप्त है। जिनकी सत्ता काल से परे और आकाश से भी परे पहुँचती है, वे प्रत्येक जीव से संबद्ध रहते हैं। इसलिए पूज्य बाबामहाराज से उनका संबंध होना कोई आश्चर्य की बात नहीं। किंतु यह संबंध कब और कैसे प्रकट हुआ—इसका अन्वेषण करना मनोहर होगा।


बाबामहाराज और स्वामी के बीच का नाता अत्यंत आत्मीय था—इतना कि स्वामी का अस्तित्व मानो स्वयं बाबामहाराज में ही प्रकट होता रहता था। ऐसे अनेक स्मरण आज भी भक्तों के अधरों पर जीवित हैं।

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संत मायबाई

पू. बाबामहाराज का जन्म वर्धा ज़िले के आर्वी ग्राम में श्रावण शुक्ल १४, शक १८४७ (३ अगस्त १९२५) के इस शुभ दिवस पर हुआ। आर्वी यह ग्राम संत मायबाई नामक पुण्यशील स्त्री-रत्न द्वारा दो सौ वर्ष पूर्व ही भगवान ज्ञानदेव के उज्ज्वल ज्ञान-प्रकाश से आलोकित कर दिया गया था।

श्रीसमर्थ रामदासस्वामी

कुछ विलक्षण स्मृतियाँ पू. बाबा और श्रीसमर्थ रामदासस्वामी के आत्मीय संबंध के प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।

एक शिष्य द्वारा सुनाई गई सज्जनगढ़ की एक घटना इस प्रकार है:

मुझे देखकर पू. बाबा बोले—‘कितनी पावन है न, यह भूमि! यहाँ का कण-कण श्रीसमर्थ के ब्रह्मतेज से कैसे नहाया हुआ है! चलो, स्नान करने।​

इतना कहकर वे उठे। उनके साथ मैं और एक अन्य त्यागी, सात्त्विक साधक—जो सज्जनगढ़ पर उपासना के लिए ठहरे थे—भी चले। पू. बाबा तालाब की ओर बढ़े। उन्होंने अपने वस्त्र उतारे और अक्षरशः उस भूमि में लोटने लगे...

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तुकडोजी महाराज

पू. बाबामहाराज के शालेय शिक्षा-काल के दौरान आर्वी में श्री राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज परमहंस अवस्था में विचरण किया करते थे।

 

पू. बाबा के पिता का श्री तुकडोजी महाराज से स्नेह जड़ गया। वह स्नेह क्रमशः गाढ़ा होता गया। महाराज कभी-कभी उनके घर ठहरते भी थे और आते-जाते रहते थे। उस पवित्र पुरुष ने पू. बाबा को आकृष्ट कर लिया।

एक बार पू. बाबा ने उनका खंजरी-भजन सुना—उस समय पू. बाबा की आयु लगभग दस वर्ष रही होगी। वे पूर्णतः मुग्ध हो गए...

श्री गुळवणी महाराज

पू. बाबा के निर्वाण-काल से कुछ समय पूर्व उनके समकालीन संत पू. गुळवणी महाराज से सोलापुर में भेंट हुई थी। किंतु उस भेंट में पूरा समय दोनों के बीच केवल दृष्टि द्वारा ही संवाद होता रहा।​

इसके पश्चात कुछ शिष्यों ने गुळवणी महाराज से पूछा—क्या हमारे बाबा इससे स्वस्थ हो पाएँगे? तब पू. गुळवणी महाराज ने कहा कि दत्तगुरु ने पू. बाबा पर एक अत्यंत महान कार्यभार सौंपा है, और उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया है। कोई चाहे कितना भी उन्हें रोकने का आग्रह करे, वे रुकने वाले नहीं हैं।

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स्वामी स्वरुपानंद

आधुनिक काल में पू. बाबामहाराज के समकालीन, नाथ-संप्रदाय के महान संत—पावस के स्वामी स्वरूपानंद—यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से पू. बाबा से भेंट नहीं कर पाए, तथापि स्वामी स्वरूपानंद का पू. बाबा के साथ ऋणानुबंध था—यह बात स्वामी द्वारा “सांगाति” मासिक के अवसर पर पू. बाबा को भेजी गई लिखित शुभेच्छाओं से स्पष्ट होती है।

पू. गुरुदेव रानडे

पू. बाबा दो बार पू. गुरुदेव रानडे के पास गए थे। पहली भेंट में निंबाळ में पू. बाबा का भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय—‘विश्वरूप दर्शन’ पर प्रवचन हुआ। इस अवसर पर पू. रानडे ने पू. बाबा से कर्नाटक–महाराष्ट्र की सीमा पर निवास करने का आग्रह किया। इस पर पू. बाबा ने उत्तर दिया—
“जैसी परमेश्वर की इच्छा होगी, वैसा ही होगा। मैं क्या निर्णय करूँ!”

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