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श्रीगुरुदेव प्राणसखा श्रीकृष्ण 

" तोचि सद्‌गुरु प्राणेश्वर ।

श्रीकृष्णनामें सुंदर ।

गोपाळांचा जो आधार ।

भक्तवत्सल ।। "

 

— पू. बाबा 

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श्रीसंत बाबा महाराज आर्वीकर आधुनिक काल के एक महान नाथ-संप्रदायीन कृष्णभक्त (रसिक महापुरुष) थे। आशा और उमंग से भरे यौवन में आर्वी से प्रस्थान करने वाले यह महात्मा, वृंदावन की प्रेमभूमि में पहुँचते ही कृष्णभक्ति में पूर्णतः बेभान हो गए थे। यमुना की जल-लहरियों से और वृंदावन की गली-गली से श्रीकृष्ण की मुरली का मंजुल नाद सुनकर वे मानो सुध-बुध खो बैठते थे। प्रेमभक्ति की सहस्र धाराओं से उस प्रेमभूमि में पू. बाबा का जीवन पूर्णतः न्हा उठा था।​

“दिखा दो न श्याम मेरे, तुम्हारे बिना जग में मैं भिखारी।
सहता नहीं विरह यह जीवन, दैव-दीनता विष-सी भारी।।”

—  पू. बाबा (मराठी से अनुवादित)

 

ऐसा कृष्ण-प्रेम से छलकता हुआ हृदय लेकर वे वृंदावन में भक्ति की मस्ती में कितने ही समय तक विहरते रहे। पू. बाबा ने अपने वृंदावन-प्रवास के दौरान जो अनुभूतियाँ व्यक्त कीं, उन्हें उन्हीं के शब्दों में देखिए—

“वृंदावन नाथ के दर्शन के लिए निकला। चित्त स्थिर था, दृष्टि गंभीर और मन अधीर। मार्ग में कहाँ चल रहा हूँ, कहाँ जाना है—कुछ-कुछ समझ में नहीं आता था। निर्विवेक अवस्था में, भीगी आँखों से उसके स्मरण-ध्यान में चलता रहा। अब न कहीं जाना, न कहीं आना; न कोई परिचित, न कोई प्रेम का अपना—केवल वह और मैं, बस हम दोनों। अखिल नभोमंडल में सुमंगल नवप्रभात श्री घनश्याम को जगा रही थी, और मेरे अंतरंग में प्रेम की प्रभात शीतल, मंद, सुगंधित स्मृति-पवन के झोंकों से विरह-व्यथा की अग्नि को धीरे-धीरे प्रज्वलित कर रही थी। मन की लगाम छूट गई और उन्मुक्त मन-अश्व वेग से दौड़ने लगा। आँखों के भीतर से वह अश्व, अश्वारूढ़ होकर, चारों ओर अपने प्रियतम को निहारने लगा। मनमोहन, ललित, लाड़िले श्यामसुंदर गोपीकुंज के संग लताकुंज में खेले, नाचे। उसी नगरी का लताकुंज मुझे उतना ही नया लगा, जितना प्रेमी को प्रेम का आँगन सदा नया लगता है। नयनमोहन, लीलामयी नटवर—नटवरलाल का क्रीडांगण निकट आता जा रहा था। देखो, सड़क के किनारे श्याम-शिखरों पर छत्र धारण किए तरुलताएँ—ऊँचे-ऊँचे कदंब की फैली हुई भुजाएँ—व्याकुल होकर श्रीधर को आलिंगन देने के लिए वहीं तड़प रही हैं। गोपालों के करुण नेत्र राधारमण मुकुंद को ज्योति के कमल-परागों से सुशोभित करने को अधीर दिखते हैं। इनके मानस-सरोवर में उगे प्रीति के नीलकमल को रात्रि में ही तोड़कर, पूजन-सामग्री सहित, ये सब गिरिधारी नंदकुवर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। पुष्पलताओं के झुरमुट नवीन पुष्प-परिमलों से सजे-धजे श्याम-दर्शन की भीड़ लगाते दिखाई देते हैं। आकाश के खग उछल-उछल कर मंगलस्वरूप, आनंददायी देवकी-सुत का पता लगाते हैं, और आहट मिलते ही—वह आ गया—ऐसा मानकर सारा वन हर्षध्वनियों से भर उठा है। देखो, ये पर्वत-कंदराएँ—योग-साधना से वियोगग्रस्त मधुसूदन की प्रकाशमयी प्रेम-साधना में कैसे तल्लीन हो गई हैं। वहाँ देखो, गोपांगनाएँ—सिर पर घट लिए, मुख से गोपालकृष्ण का जय-नाद करती—वे मृगनयनी मृगियाँ विरह-दावाग्नि सह न सकीं, ऐसी व्याकुल दिखती हैं। नेत्रों में प्रतीक्षा, मन में व्याकुलता, मुख पर मलिनता और चाल में मंदता—प्रेम के दौड़ते पग सहज ही प्रकट हो रहे हैं। गोपाल-सखा के दर्शन के बिना सारा विश्व कितना अधीर, अस्थिर और व्याकुल होकर तड़पता दिखाई देता है। है भी तो—तभी तो प्रेम होगा, है न? प्रेम का अंत नित्य प्रेम में ही होता है। न उसमें टूटन, न पूर्णता, न क्षीणता, न भयावहता, न विद्रूपता—सदा प्रस्फुटित कमलिनी की कली। कितनी दीनवत बैठी हैं वे गायें! आँखों में केवल प्रेम की तार और हरि-मिलन की तीव्र लालसा झिलमिला रही थी। मानो नेत्र ही उनके विरह-प्रश्वास का साधन हों! विरह नेत्रों से ही अश्रु-विमोचन करती हुई वे गोठणियों में बैठी हैं। अहाहा! मोहना! इस जीवन पर कैसी जादू कर दी तुमने। माधव! इन नन्हे-नन्हे जीवों पर कैसी मोहिनी डाल दी तुमने? सारा जग जादू के मधुकर के प्रेम से भरा हुआ दिखता था। मन पूर्व स्मृतियों में डूबकर रोने लगा।”

(संत बाबा द्वारा लिखित मूल संदेश का हिंदी अनुवाद)

सद्गुरु माउली ज्ञानाई

माचणूर में पू. बाबा संत ज्ञानदेव के गुरु-प्रेम में ही रमे रहे और कृष्ण-सखा के अपरिमित प्रेम-भक्ति में डूब गए। वहाँ उन्हें जिस विशाल, आकाश-व्यापी प्रेम की अनुभूति हुई, उसे उन्होंने अत्यंत शास्त्रीय शैली में आगे आने वालों के लिए साहित्य में अंकित कर दिया। कृष्ण-प्रेम से ओतप्रोत संत ज्ञानदेव के अद्वितीय भक्तितत्त्व का पू. बाबा ने विस्तार से विवेचन किया है।​

“ज्ञानदेव आकाश के गर्भ की ममता हैं।
जगत में प्रेम की खड़खड़ाती सरिता हैं।
शोकग्रस्त जीवों के हृदय को आनंदित करने वाली प्रेम-ग्रंथि—
समस्त जीवों के जीवत्व का एकत्रित हुआ साहंकार ही ज्ञानदेव हैं!

‘माऊली’ शब्द भी उनके चरणों में ममता की आशा लेकर सो गया।
विश्व-जननी का गौरव उसकी दया से होता है,
पर मेरी ज्ञानाई का गौरव—सूर्य की अनंत किरणों से भी किया जाए,
तो भी पर्याप्त होना कठिन है!”


— पू. बाबा (मराठी से अनुवादित)

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पू. बाबा समय-समय पर आळंदी जाते रहते थे। एक बार उनका वहीं प्रवास था और उनके साथ माचणूर के कुछ साधक-मंडली भी थी। उसी समय एक अमेरिकी नागरिक वहाँ आया, जो अपने देश के वैज्ञानिक और भौतिक जीवन से ऊब चुका था। उसने संन्यासी की भाँति मुंडन कराया, भगवा वस्त्र धारण किया और भारत आ गया। मुंबई में किसी ने उसे संत ज्ञानेश्वर के विषय में काफ़ी जानकारी दी और वह उनके बारे में और जानने को उत्सुक हुआ। वह पुणे में दो दिन ठहरा; वहाँ भी उसने कई लोगों से ज्ञानेश्वर के विषय में पूछताछ की। अंततः वह आळंदी पहुँचा। पुणे-प्रवास के दौरान किसी ने उससे कहा था कि वहाँ अभी-अभी बाबामहाराज आए हैं और वे ज्ञानेश्वर के विषय में सब विस्तार से बताएँगे।

उसके पहुँचते ही पू. बाबा उठकर सामने गए और कुछ समय वार्तालाप हुआ। उस अमेरिकी सज्जन ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की और पू. बाबा से संत ज्ञानेश्वर के विषय में कुछ बताने का अनुरोध किया। बाबा ने उससे कहा—आज तुम और मैं दोनों ही ज्ञानेश्वर के सामने हैं। तुम यहाँ आठ-दस दिन रहो और अनुष्ठान करो; तब स्वयं ज्ञानेश्वर ही तुम्हें अपनी जानकारी देंगे। यह कहकर बाबा मुंबई जाने के लिए निकल पड़े और उस अमेरिकी को वहाँ का पता भी दे दिया। वह अमेरिकी साधना करने लगा, पर दस दिन बीत जाने पर भी उसे संत ज्ञानेश्वर का कोई बोध न हुआ, इसलिए वह मुंबई में बाबा के निवास पर पहुँचा। घंटी बजाते ही बाबा सामने आए। उस समय उस अमेरिकी ने पहले बाबा को देखा और फिर उन्हीं बाबा में संत ज्ञानेश्वर का रूप देखा। ऐसी संभ्रमित अवस्था में तीन-चार बार देखने के बाद वह फूट-फूटकर रोने लगा। तब बाबा ने उसे सांत्वना दी और रोने का कारण पूछा। वह भर्राए स्वर में विनम्रतापूर्वक बोला—आप ही ज्ञानेश्वर हैं, तो मुझे क्यों भटकाते हैं? मुझे अपनी सारी जानकारी दीजिए। तब बाबा ने उसे संत ज्ञानेश्वर का उदात्त इतिहास, उनका कार्य और ज्ञानेश्वरी की महान परंपरा—इन सब के विषय में विस्तार से बताया।

पू. बाबा का लिखित दिव्यामृतधारा—यह अनमोल ग्रंथ—ज्ञानेश्वरी के बारहवें अध्याय पर की गई प्रतिपद-टीका है। ज्ञानेश्वरी श्रीमद्भगवद्गीता पर प्रतिपद-टीका है; और दिव्यामृतधारा ‘ज्ञानेश्वरी—अध्याय बारह’ पर प्रतिपद-टीका है। ज्ञानेश्वरी पर इस प्रकार की प्रतिपद-टीका यह पहली ही है। वस्तुतः ज्ञानेश्वरी पर प्रतिपद-टीका करना आवश्यक है—यह विचार इससे पहले किसी के मन में आया ही नहीं था; और बाद में भी आज तक ऐसी दूसरी टीका नहीं हुई। ज्ञानेश्वरी का प्रत्येक पद सार्थक, सहेतुक और अपने-आप में निश्चित प्रयोजन तथा कार्य लेकर आया है, और वह अपना कार्य निश्चित रूप से संपन्न करता है—यदि कोई यह बात आत्मविश्वास से कहे, तो प्रथमदृष्टीसे सत्य मानना कठिन होता है। किंतु दिव्यामृतधारा में दी गई प्रतिपद-व्याख्या पढ़ने पर यह बात स्पष्ट रूप से स्वीकार्य हो जाती है।​​

इस ग्रंथ में पू. बाबा लिखते हैं—
“पहले ही गीता-अमृत दिव्य संजीवन है; उससे भी आगे ज्ञानेश्वरी संजीवन का रसायन है। गीता ने संस्कृत की दरारों से निकलकर विद्वानों के ग्राम-प्रांगण को स्पर्श किया; किंतु ज्ञानेश्वरी महाराष्ट्र की सूखी बंजर भूमि में भी बहने लगी और वहाँ उसने हरित नंदनवन खड़ा कर दिया। सकल के अभेद-निष्ठा का शीतल चंद्रप्रकाश उसमें भक्तिचंद्रमा होकर प्रसृत हुआ। समस्त जगत को अधिकार की समान भूमि पर आरोहित कर दिया—यही ज्ञानेश्वरी का वैशिष्ट्य है। भगवान ज्ञानेश्वर के वैभवपूर्ण भक्ति-ध्वज का गौरव करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ।” 
(मराठी से अनुवादित)

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