पू. बाबामहाराज द्वारा निर्धारित दिनचर्या
प्रत्येक व्यक्ति को प्रातः साढ़े चार से पाँच के बीच उठना चाहिए। इसके पश्चात प्रातःस्मरण, प्रातर्विधि तथा स्नान छह बजे तक पूर्ण कर लेना चाहिए। छह बजे सूर्य की ओर मुख करके सूर्यनमस्कार करना चाहिए। अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार आन्हिक संपन्न कर, अपनी इष्टदेवता की मानसपूजा करनी चाहिए। आठ बजे तक यह समस्त क्रम पूर्ण कर लेना चाहिए।
इसके बाद अपने व्यावहारिक जीवनक्रम का आरंभ करें। व्यवहार में संलग्न रहते समय आचार-संहिता सदा दृष्टि के सामने रखनी चाहिए। सायंकाल साढ़े छह बजे समस्त व्यवहारिक कार्यों से वृत्ति को दृढ़तापूर्वक अलग कर लेना चाहिए। यदि उस दिन का कोई कार्य अपूर्ण रह गया हो, तो उसे अगले दिन प्रातः आठ बजे के बाद संपन्न करें।
इस प्रकार सायंकाल साढ़े छह बजे मुख-प्रक्षालन तथा हाथ-पैर धोकर एकांत की ओर वृत्ति प्रवृत्त करनी चाहिए। साढ़े सात बजे तक एक घंटा, यथासंभव प्रकृति के सान्निध्य में, मन को शांत कर बैठने का अभ्यास करें। इस समय प्रार्थना, चिंतन अथवा स्मरण करने में कोई बाधा नहीं है; परंतु एकांत का होना निश्चित होना चाहिए। साढ़े सात बजे के बाद गृहकार्य—बच्चों की व्यवस्था देखना तथा सप्रेम सभी को संतुष्ट करना—इन कार्यों में प्रवृत्त हों।
रात्रि आठ से नौ के बीच अल्प भोजन अथवा फलाहार करें। नौ बजे के बाद, यदि संभव हो, तो सद्ग्रंथ-पठन एवं सत्श्रवण करें। दस बजे तक यह क्रम पूर्ण कर लें।
दस बजे के बाद कुछ समय शवासन करके चित्त को शांत करें। उसी समय यदि निद्रा आ जाए, तो नामस्मरण करते हुए शयन करें; अथवा पंद्रह–बीस मिनट के पश्चात अपनी उपासना-स्थली पर माला लेकर ध्यान-भूमि में आरूढ़ हों।
इस प्रकार इस दैनंदिन उपक्रम का दृढ़ निश्चयपूर्वक पालन करना चाहिए। साथ ही, फुरसत के समय में यथासंभव एकांत का सेवन करें; और उस समय में कुछ अंश कौटुंबिक स्वास्थ्य पर विचार, सक्रियता तथा सत्संग ग्रहण जैसे शांति और संतोष प्रदान करने वाले कर्मों में लगाएँ।

पू. बाबामहाराज माचणूर में श्री मल्लिकार्जुन मंदिर में पूजा करते हुए
पूजा के समय करने योग्य बातें :
(१) घर में अपना एक पृथक मंदिर होना चाहिए; और यह संपूर्ण क्रम वहीं संपन्न करना चाहिए।
(२) श्रीविग्रह के सौंदर्य से ज्यादा बाह्य श्रृंगार अधिक न हो। ऐसा साज-संवरण हो कि चित्त विग्रह के सौंदर्य में लीन हो जाए।
(३) एक दिया और एक धूपदान—इनके अतिरिक्त अन्य सामग्री देवता के पास न हो।
(४) पूजा के उपचारों के पश्चात ज्ञानेश्वरजी की आरती कहनी चाहिए।
(५) तीर्थ-प्रसाद ग्रहण करें और पसायदान का पाठ करें।
पसायदान के पश्चात तीर्थ-प्रसाद का सेवन करें और विनम्रतापूर्वक नमस्कार करके पूजा संपन्न करें।
