प्रातःस्मरण
प्रातःकाल के उदय के साथ आत्मभान के सूर्य का उदय परिचित कराने वाले ये मानो अचूक मंत्र ही हैं। इनके पाठ से अपने स्वरूप की जागृत संवेदना दिन के कर्म-व्यापार में सक्रिय रहेगी और इस प्रकार समूचा दिन प्रभु की मंगल आराधना बन जाएगा। इसी प्रकार जागृत हुई पवित्र भावनाओं का निर्मल प्रवाह दिनकर के अस्ताचल पर विशुद्धता के साथ समर्पित होगा और रात्रि की प्रशांत निद्रा में पवित्रता का सागर उमड़ आएगा। साधक के जीवन-क्रम में ही साधना निहित होनी चाहिए। केवल कार्यक्रम करने से, यदि जीवन-प्रवाह उसके अनुरूप न हो, तो संपूर्ण जीवन निराशामय होने लगता है। इस हेतु, प्रातःकाल के दिव्य स्फुरण से पूरे दिन को सुख के उर्ध्वक्रम में व्यतीत कर, रात्रि की विश्रांति को स्वानंद और निरामय शांति से परिपूर्ण करना जीवन का एक आवश्यक कार्यभाग है।
जीवन के अंतरंग में क्रीड़ा करता मन जिन त्रिविध अवस्थाओं (जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति) से होकर विचरता है, उन भेदों को अलग न रखते हुए उन्हें एक ही सुख-संवेदना में अभिन्न बनाए रखने की व्यवस्था इस पाठ से होती है। इस प्रकार जीव इन तीनों अवस्थाओं का स्वानंदपूर्वक अनुभव कर सके—ऐसी तुरीय अवस्था का महान वरदान यह पाठ साधकों को निश्चित ही प्रदान करता है, ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा।
स्वात्मदीक्षा
धार्मिक आचारों की दुनिया में प्रवेश करने से पहले अंतःकरण में परमार्थ-विचारों का जागरण होना आवश्यक है। जीवन धर्ममय होने के लिए परमार्थ के मंदिर का विशाल निनाद करने वाला तत्त्व-स्वर प्रत्येक भावुक साधक को पहले ध्यान में ग्रहण करना उचित है। यदि ऐसा न हुआ, तो संभव है कि आप पुनः यह परंपरागत भूल कर बैठें कि “केवल आचार-निष्ठा का संकुचित स्तवन ही धर्म है।” इसलिए अध्यात्म-विवेक से अपने अंतरंग को जागृत करें और फिर आगे के आचरण से संपूर्ण जीवन को विशाल और पावन बनाएं। इसी उद्देश्य से ‘स्वात्मदीक्षा’ का यह प्रयोग है।
सायं प्रार्थना
हृदय का आंतरिक प्रदेश स्थिर हो, परमेश्वर का स्मरण और भजन सहज घटित हो—इसी हेतु प्रार्थना है। प्रार्थना करते समय हम सर्वव्यापक परमेश्वर को क्यों पुकारते हैं, यह समझने के लिए प्रार्थना में अपना हृदय उँडेल देना चाहिए। उसके लिए हृदय में कोई संकेत होना चाहिए—चित्तशक्ति के प्रकट होने का संकेत। बालक की पुकार में जो करुणा होती है, वैसा ही हृदय अपने भीतर होना चाहिए; तभी विकास संभव होगा। जब प्रेमपूर्ण निर्मलता उपस्थित होती है, तब परमेश्वर की अनुभूति होने लगती है। प्रार्थना हृदय-पटल पर उपस्थित विक्षेप और आवरणों को दूर करती है—ऐसी प्रार्थना होनी चाहिए। प्रार्थना केवल की न जाए, बल्कि घटित हो; उसमें स्वाभाविक आविष्कार होना चाहिए, अन्यथा प्रभु का संकेत समझना कठिन है। परमेश्वर का आह्वान हमारे हृदय की पवित्रता के लिए ही है; अतः हृदय को निर्मल करना ही लक्ष्य होना चाहिए। प्रार्थना के द्वारा विश्व के अणु-परमाणु में व्याप्त परमेश्वर के अस्तित्व के प्रति तथा सभी जीवों के प्रति करुणा जागृत होनी चाहिए। परमेश्वरीय अर्थ परमेश्वर की कृपा से प्रार्थना द्वारा ही प्राप्त होता है। प्रार्थना से सभी हृदयों का एकत्व संभव है। निकृष्ट मन को परिवर्तित कर उसे पवित्र और बलवान बनाने का कार्य प्रार्थना करती है। परमेश्वर को अपने मन में स्थिर करने तथा उसकी शक्ति को अपने भीतर जागृत करने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।
