पू. बाबा की वाणी

पू. बाबा : श्रीकृष्ण-प्रेम में पूर्णतः विलीन हुए भक्त-शिरोमणि! उनके मुख से प्रवाहित होने वाली दिव्यामृतधारा सद्गुरु-कृपा के वैभव की अमर चैतन्योपनिषद के समान थी। प्रवचन के दौरान पू. बाबा के स्वर में निर्मलता और करुणा का आर्त भाव होता था। योगशास्त्र में ऐसे स्वर को *सुषुम्ना स्वर* कहा जाता है। उनके प्रवचन श्रोताओं के अंग-अंग में रोमांच उत्पन्न करने वाले, संबोधनात्मक शब्दों से परिपूर्ण होते थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो यह वक्ता सम्पूर्ण जीवन को ही अपने हाथों में ले लेता हो।
पू. बाबा के प्रत्येक शब्द में विलक्षण तेज और धार होती थी। उनके वक्तृत्व की भंगिमा और प्रस्तुति अद्भुत थी, और उसे प्रस्तुत करते समय उनके चेहरे पर ऐसी तेजस्विता और अलौकिकता विलसित होती थी कि सब लोग मानो मोहनास्त्र छोड़े जाने पर जैसे मंत्रमुग्ध हो जाते हों। पू. बाबा बोलते समय उपनिषद्-कालीन ऋषि के समान प्रतीत होते थे। सहज आसन, सीधी और तनी हुई गर्दन, गंभीर तत्वज्ञ मुखमुद्रा, तेजस्वी नेत्र, आश्वस्त करने वाला स्वर, शब्दों की सहज किन्तु अपेक्षित प्रभाव उत्पन्न करने वाली फेंक—सब कुछ अद्वितीय होता था। उनके स्वर में एक मोहक नाद भी निहित रहता था।
पुस्तकीय ज्ञान के बदले जीव-जगत के ज्ञान का संदेहशून्य प्रकटन उनकी वाणी में होता था। स्वयंसत्य की सहज और उत्स्फूर्त अभिव्यक्ति उनके प्रवचनों में दिखाई देती थी। उनका विवेचन इतना मूलगामी, आत्मीय, रसपूर्ण और हृदयस्पर्शी होता था कि समय की गति जैसे थम गई हो, ऐसा अनुभव होता। श्रोताओं को बाह्य जगत सहज ही विस्मृत हो जाता। उनकी आँखें स्वतः मूँद जातीं और अंतरंग में कुछ अद्भुत, अत्यंत मधुर, चित्तप्रत्ययी संवेदनाओं की तरंगें उठने लगतीं।
पू. बाबा की वाणी का वेग, प्रवाह और आवेग अत्यंत प्रबल होता था। शब्द-सृष्टि का भी कोई ईश्वर होता है, और उस शब्देश्वर का दर्शन उनकी वाणी से होता था। केवल प्रवचन के समय ही नहीं, बल्कि उनकी सम्पूर्ण वाणी ही प्रवचनमयी होती थी। भोजन करते समय, जल ग्रहण करते समय, चलते हुए, चर्चा करते हुए अथवा किसी भी प्रसंग में, पू. बाबा जो कुछ भी कहते, वह सब बोधमय और उपदेशमय ही होता। विषय कोई भी हो और जैसा भी हो, उसमें से पू. बाबा का धर्मनिनाद गर्जना के साथ प्रकट हो उठता था।
उनका चिंतन चैतन्यशील होने के कारण उनकी वाणी में अमृत-स्पर्श होता था। श्रोताओं को आकृष्ट कर लेने की शक्ति पू. बाबा में विलक्षण थी। वे कहते थे कि इस प्रवचन में मैंने प्रत्येक को कुछ-न-कुछ अवश्य दिया है। प्रवचन के पश्चात श्रोता लौटते समय आनंदित, आत्मानंद में स्थित और किसी न किसी रूप में परमानंद का अनुभव करते थे। देववाणी इससे भिन्न कुछ और होती ही नहीं।
