माचणूर आश्रम
आत्मिक सुख के प्रति अनुराग रखते हुए लौकिक सुखों का त्याग कर विराट पुरुष के दर्शन की ओर अग्रसर साधकों के लिए—और इतना ही नहीं, उस दर्शन की आकांक्षा से तड़पते गृहस्थ मुमुक्षुओं को भी कुछ समय अपनी साधना के लिए एकांत प्राप्त हो—इस उद्देश्य से परमपूज्य श्री बाबामहाराज ने श्रीक्षेत्र माचणूर में ‘मोक्षधाम’ आश्रम की स्थापना की।

जाति, धर्म, पंथ और संप्रदाय निरपेक्ष आधार पर यह स्थापना हुई है; यहाँ ‘सर्वात्मक श्रीगुरुदेव’ ही अधिष्ठान हैं और ‘सहजता’ इसकी विशेषता है।

पू. बाबा माचणूर के कार्य के विषय में कहते हैं :
“माचणूर का मूल सिद्धांत हमने यह निर्धारित किया है कि यदि विराट पुरुष का दर्शन करना है, तो पहले ‘जीवन’ को समझना आवश्यक है। साधु-संतों ने अपने दोनों हाथ उठाकर कहा है—अमृत की ओर देखो। तुम अमर हो सकते हो, तुम मुक्त हो सकते हो, तुम सिद्ध हो सकते हो। यदि सामर्थ्य प्राप्त करना है, तो उस विराट पुरुष का परिचय करना आवश्यक है। माचणूर की यह तात्त्विक भूमिका है कि हम श्रीगुरु—उस विराट पुरुष—के पुजारी हैं।
मैं श्रीकृष्ण की पूजा अत्यंत आनंद और प्रेम से करता हूँ; मुझे राम-कृष्ण प्रिय हैं। मैं उन्हें ही अपना गुरुदेव मानता हूँ। उनका स्मरण होते ही रोमांच जाग उठते हैं और एक प्रकार की दिव्य मस्ती छा जाती है, क्योंकि वह भारतीय चेतना की अनुभूति है। तुम्हारे-हमारे ही स्वरूप से वह प्रकट होता है। कृष्ण, राम अथवा जो-जो अवतार हुए हैं, वे सब श्रीगुरु के ही आविर्भाव हैं।
जो भी मन ईश्वर की ओर जाने वाले हों, ऐसे लोग यहाँ एकत्र हों। उन्हें विश्व की न्यूनतम आवश्यकताओं पर आधारित रहना चाहिए और स्वश्रम से अर्जित जीवन जीने की धारणा रखनी चाहिए। इससे उन्हें श्रीगुरु की पूजा तथा उनके अवतरण के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।
साधना स्वभावतः सहजगामी भावना है। यदि परमात्मा तक ले जाने वाला मार्ग दिव्य है, तो साधक की प्रत्येक छोटी-सी क्रिया में भी मनुष्य के भीतर का परमात्मा प्रकट होना चाहिए। माचणूर में निरंतर साधना ही बनी रहनी चाहिए।
हमारा धर्म मूलतः साधना-धर्म है। माचणूर में सहजगतिक साधना को स्वीकार किया गया है। यहाँ हम सभी उपासना-परंपराओं को स्वीकार करते हैं, क्योंकि उपासना उत्स्फूर्त होती है।
सज्जनता का निर्माण करना और साधुता का निर्माण करना—यही एकमात्र मंगल कार्य है, जिसे हमें माचणूर से संपन्न करना है।”

