मराठी ग्रंथ
“सभी शास्त्रों के अध्ययन में चाहे कितनी ही प्रगति क्यों न हो जाए, गुरु-कृपा के बिना वह शास्त्रज्ञान (सारस्वत) अनुभवहीन होने के कारण अपूर्ण ही रहता है।
गुरु-कृपा के बिना कोई भी विद्या शुद्ध नहीं हो सकती।”
— संत श्री बाबामहाराज आर्वीकर (मराठी से अनुवादित)

दिव्यामृतधारा
इस ग्रंथ में संत मोरेश्वर (बाबामहाराज आर्वीकर) ने धर्मजीवन तथा अद्वितीय भक्तियोग का एक नवीन दर्शन प्रस्तुत किया है। अपने ज्ञानेश्वर-दर्शन की द्वैताद्वैत-विलक्षण भक्ति और सामरस्य-सिद्धांत के रहस्य तथा श्रेष्ठत्व को उन्होंने एक वाक्य में संक्षेपित किया है। वे कहते हैं—
ज्ञानेश्वरी का भक्तिपंथ मोक्ष के मार्ग से वैकुंठ के सिंहासन तक जाने वाला नहीं है, बल्कि वह ऐसा पंथ है जो स्वयं मोक्षाधिपति भगवंत को ही इस विरान रेगिस्तान में नृत्य करने के लिए आमंत्रित करता है। ज्ञानेश्वरी में निहित तत्त्वज्ञान और काव्य, जीवन और साक्षात्कार, अर्थ और संवेदना, दिव्यता और रस की विविध अभिव्यक्तियों का अनुभव करते हुए बाबामहाराज ने दिखाया है कि ज्ञानेश्वरी की महिमा और अद्वितीयता उसके ‘नाथपंथीय भक्तियोग’ में किस प्रकार समाहित है। स्वयं संत मोरेश्वर (बाबामहाराज) योगेश्वर हैं—श्रेष्ठ भक्तियोगी और कर्मयोगी।
इस समप्रज्ञ योगी पुरुष का साक्षात्कारवादी जीवन-धर्म ‘दिव्यामृतधारा’ के रूप में प्रकट हुआ है। ‘दिव्यामृतधारा’ पृथ्वी पर अवतरित आकाशगंगा के समान है—वह सद्धर्म की गंगा है। उसके पवित्र धारातीर्थ में खड़े होकर उसी के पावन जल की अंजलि उसे अर्घ्य के रूप में अर्पित करनी है और कृपा-प्रसाद के लिए पुनः वही अंजलि आगे बढ़ानी है।
(डॉ. वी.डी. कुलकर्णी का अनुवादित संदेश)
मी पाहिलेले बाबा
पू. बाबामहाराज आर्वीकर की हृदयस्पर्शी स्मृतियों का संकलन।
इस पुस्तक की कथाएँ वर्तमान में अंग्रेज़ी में अनूदित की जा रही हैं। उन्हें पढ़ने के लिए हमारे अंग्रेज़ी ब्लॉग पर जाएँ।

गीताप्रबोध
पू. बाबा ने एक जिज्ञासु साधक को क्रमबद्ध रूप से लिखे गए पत्रों के माध्यम से भगवद्गीता के प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय अध्याय के सोलहवें श्लोक तक धर्मनिष्ठ दिव्य कर्मयोग का जो प्रेरणास्फूर्त मार्गदर्शन किया है, वही इस ग्रंथ में संकलित है।


साधना-संहिता
यह (पद्यरूप में रचित) ग्रंथ साधकों को यथार्थ और आत्मीय मार्गदर्शन प्रदान करता है—साधना में आने वाली बाधाओं को पहचानकर उन्हें दूर करने के उपाय बताता है, तथा राजयोग, लययोग, हठयोग आदि के आधार पर संपूर ्ण जीवनयोग का पथ प्रदर्शित करता है। साधना के गूढ़ रहस्यों को स्पष्ट रूप से उद्घाटित करना इसकी विशेषता है।
नित्य-बोध
साधकों के दैनिक चिंतन के लिए जनवरी १ से दिसंबर ३१ तक (प्रति दिन एक पृष्ठीय बोध) की संरचना में यह ग्रंथ प. पू. बाबामहाराज आर्वीकर के सद्ग्रंथों और प्रवचनों से संकलित किया गया है। इसमें दिए गए पू. बाबा के बोधानुसार जीवन जीने का प्रयास करने पर मानव जीवन के अंतिम लक्ष्य—ईश्वरप्राप्ति—के समीप हम इसी जीवन में निश्चित रूप से पहुँच सकते हैं। इसकी विषयवस्तु इतनी व्यापक है कि जीवन के प्रत्येक स्तर के व्यक्तियों को अपनी रुचि के अनुसार इसमें मार्गदर्शन प्राप्त होता है।





