top of page

पू. बाबा- व्यक्तिदर्शन

PHOTO-2022-03-24-22-49-24.heic

पू. बाबा का रूपदर्शन अत्यंत मनोहर था। काले, कोमल केश—गर्दन से कंधों तक पहुँचने वाले—पीछे की ओर सँवारे हुए, स्वच्छ और सुसज्जित रहते थे। ललाट चौड़ा, नाक सुदृढ़, मूँछें और दाढ़ी सलीके से बढ़ाई हुई थीं। मुख-मुद्रा गंभीर और चिंतनशील होते हुए भी सदा हास्यभाव से अभिमुख रहती थी। स्वर मृदु होते हुए भी घन था; नेत्र विशाल और सर्वार्थ से आकर्षक थे।

 

शरीर-रचना ऊँची और सुदृढ़ थी। श्वेत, शुभ्र लुंगी और उसी प्रकार का शुभ्र, मुलायम और चकदार कुर्ता वे धारण करते थे। कभी-कभी हरमूंजी मोतिया रंग का वस्त्र पू. बाबा सिर पर बाँधते थे। वर्तमान में रहते हुए भी बीच-बीच में जैसे कहीं और होकर आ जाते हों—ऐसा आत्मतंद्रा-भाव अनुभव में आता था।

 

कृपालुता, क्षमाशीलता, करुणा और प्रसंगानुसार कठोरता—ऐसे अनेक गुण-विशेष पू. बाबा के सान्निध्य में अनुभव होते थे। हम किसी से भिन्न हैं—संत, महात्मा, महाराज, गुरु—ऐसा कोई भी विशेषत्व पू. बाबा के विहार में नहीं था। परिवार और समाज में परस्पर जैसी व्यवहार-रीति होनी चाहिए, वैसा ही उनका व्यवहार रहता था। किसी के घर जाने पर वहाँ जैसी व्यवस्था होती, उसी में वे सहज समरस हो जाते। समृद्ध परिवार के मधुर पदार्थ जैसे वे ग्रहण करते, वैसे ही किसी निर्धन के घर यदि बासी अन्न शेष हो, तो बिना किसी के कहे स्वयं ढूँढ़कर निकालते और सबके साथ स्वयं भी खाते। अपेक्षारहित जीवन कैसा होना चाहिए—यह उनके रूप और आचरण से साक्षात् प्रकट होता था।

 

कार्य के विषय में (चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो) उसे उचित ढंग से करना और करवाना—इस पर उनका विशेष आग्रह रहता था। मेज़ पर रखी आलपिन भी इधर-उधर रखी हुई उन्हें स्वीकार्य नहीं होती थी। प्रत्येक वस्तु को अपने स्थान पर रखने के संबंध में पू. बाबा की स्पष्ट हिदायत रहती थी। वे कहते थे कि सुव्यवस्था ही परमार्थ की मूल नींव है।

 

पू. बाबा अत्यंत नटखट भी थे। हर अवसर पर भिन्न-भिन्न भावों, अवस्थाओं और रूपों में उनके दर्शन होते। वे वास्तव में कैसे हैं, उनकी ठीक-ठीक अवस्था क्या है—इसका भेदन हो ही नहीं पाता था। एक बार उन्होंने हरि के समक्ष नृत्य कैसे करना चाहिए, इसका अभिनय करके दिखाया। इतना ऊँचा-भरा, सुदृढ़ पुरुष-देह, परंतु रबर की भाँति लचीला होकर मुड़ रहा था। हाथ-पैरों की गति इतनी कोमल और मोहक कि दृष्टि टिकाकर देखते ही रहना पड़े। मुद्रा-अभिनय तो मानो किसी निपुण मुद्रा-नर्तकी को भी लज्जित कर दे! और वह अभिनय-नृत्य समाप्त होते ही फिर वही निरागस, मुक्त सहजता—मानो मैं कोई विशेष हूँ या मेरे पास कोई अलौकिक कला है, इसका लेशमात्र भी आभास नहीं।

 

जैसे जल किसी भी रंग को सहजता से धारण कर ले, वैसे ही कोई भी भाव पू. बाबा स्वाभाविक रूप से धारण कर लेते थे। उनके भाव-लीला के प्रसंगों से वे लोगों के जीवन की दिशा ही बदल देते थे। ऐसी यह विशालता माचणूर-क्षेत्र में देह-रूप से खेली, क्रीडा की और इस महान संत ने अनेक लोगों को साक्षात् यह अनुभूति कराई कि विश्व का खेल कैसा होता है।

 

मराठी पुस्तक ‘मी पाहिलेले बाबा’ में पू. बाबा से जुड़ी और अधिक स्मृतियाँ पढ़ें।

511828D2-2AF9-4696-AC2B-F0DCC0B78CED.heic
IMG_8880.heic

Terms & Conditions

Privacy Policy

Accessibility Statement

©2035 by Shashwat Sangati. Powered and secured by Wix

bottom of page