जीवनपट
जन्म
आर्वी,
श्रावण शुक्ल १४, शक १८४७
दि. ३ अगस्त १९२५, सोमवार, सायं ६:३० बजे
१९२५
विद्यालय जीवन में संस्कृत गुरुगीता की मराठी में रचना।
मैट्रिक कक्षा में अध्ययन के दौरान १६ वर्ष की आयु में पिता श्री प्रभाकरपंत का देहावसन|
घर और आर्वी का त्याग किया।
१९४१
पंढरपुर, नासिक, ओंकारेश्वर, नेपाल, हिमालय, जगन्नाथपुरी, गाणगापुर, नागपुर और अक्कलकोट में समाज की स्थिति के निरीक्षण तथा कार्य-नियोजन हेतु भ्रमण।
संत तुकडोजी महाराज का सान्निध्य तथा उनके कार्यों में सहभाग।
१९४२ से १९५३
(लगभग)
अक्कलकोट — वटवृक्ष मंदिर में पू. बाबा के सप्ताहभर प्रवचन; इससे अचानक प्रसिद्धि प्राप्त हुई।
निंबाळ जाकर पू. गुरुदेव रानडे से भेंट।
१९५४
श्री स्वामी समर्थ (अक्कलकोट) के आदेशानुसार माचणूर आगमन।
चातुर्मास समापन उत्सव का आयोजन।
१९५५
चैत्र मास में मुंबई सफर के दौरान तीन दिनों में ‘श्रीरामजन्माख्यान’ का लेखन; तत्पश्चात ‘प्रार्थना प्रभात’, ‘प्रभात पाठ’ और ‘आचार संहिता’ पुस्तिकाओं का प्रकाशन। आळंदी में निवास तथा संत ज्ञानदेव के आदेश से मात्र ग्यारह दिनों में ‘साधना-संहिता’ जैसे अलौकिक ग्रंथ की रचना पूर्ण।
माचणूर में प्रथम साधना सप्ताह महोत्सव।
१९५६
दूसरा साधना महोत्सव — दादर लक्ष्मीनारायण बाग में; दिनांक २२-१-५७ से २७-१-५७।
१९५७
पू. बाबा के मुंबई तथा उपनगरों में प्रवचन।
पू. बाबा १९५८ से प्रत्येक मुंबई यात्रा के दौरान भिकोबा निवास में रहने लगे।
१९५८
श्रीसंतस्मृति महोत्सव का प्रथम वर्ष आयोजन — पुणे; दिनांक १-५-६० से ८-५-६०।
जुलाई माह में शिष्यों के साथ पू. बाबा का वृंदावन यात्रा के लिए प्रस्थान।
१९६०
संतधर्म प्रसारक मंडल की स्थापना; दिनांक ८-९-६२।
१९६२
पू. बाबा ने भगवद्गीता के पहले दो अध्यायों तथा तीसरे अध्याय के कुछ श्लोकों का विवेचन करने वाले ७५–८० पत्र (अक्टूबर ६३ से जून ६५) लिखे।
१९६३
संत ज्ञानदेव के हरिपाठ का रहस्य प्रकट करने वाला लेखन।
१९६४
‘दिव्यामृतधारा’ ग्रंथ का ले खन पू. बाबा ने १९६५ के चातुर्मास में आरंभ किया।
१९६५
‘दिव्यामृतधारा’ प्रथम खंड का प्रकाशन राष्ट्रीय पंडित खुपेरकरशास्त्री के हस्ते संपन्न।
वेदमूर्ति श्री दा. सातवळेकर के शताब्दी जन्मोत्सव के अवसर पर पारडी गमन; सरसंघचालक गोळवलकर गुरुजी की अध्यक्षता में अभिष्ट-चिंतनपर भाषण।
१९६६
पू. बाबा का इंदौर प्रस्थान। विभिन्न साहित्य संस्थाओं की ओर से ‘मधुरा भक्ति’ पर उनके प्रवचन हुए।
१९६७
शिष्यों के साथ उत्तर भारत यात्रा।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर ‘सांगाति’ त्रैमासिक का शुभारंभ।
अखिल भारतीय धर्मोत्सव सभा की स्थापना।
१९६८
हुपरी में विठ्ठल मूर्ति की प्रतिष्ठापना।
सिद्धसारणा संघ की स्थापना।
१९७०
हुपरी में रामनवमी महोत्सव; विठ्ठल मंदिर का निर्माण।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गोळवलकर गुरुजी ने सोलापुर आकर पू. बाबा से भेंट की।
शक्तिपात दीक्षा के अध्वर्यु श्री गुळवणी महाराज ने सोलापुर आकर पू. बाबा से भेंट की।
१९७१
२ दिसंबर, गुरुवार, प्रातः ९ बजे २० मिनट — पू. बाबामहाराज का मोक्षधाम, माचणूर में महानिर्वाण। (मार्गशीर्ष पूर्णिमा, शक १८९३।)
