सायं प्रार्थना
प्रार्थना का रहस्य — पू. बाबामहाराज के शब्दों में (मराठी से अनुवादित) :
हृदय का आंतरिक प्रदेश स्थिर हो, परमेश्वर का स्मरण और भजन सहज घटित हो—इसी हेतु प्रार्थना है। प्रार्थना करते समय हम सर्वव्यापक परमेश्वर को क्यों पुकारते हैं, यह समझने के लिए प्रार्थना में अपना हृदय उँडेल देना चाहिए। उसके लिए हृदय में कोई संकेत होना चाहिए—चित्तशक्ति के प्रकट होने का संकेत। बालक की पुकार में जो करुणा होती है, वैसा ही हृदय अपने भीतर होना चाहिए; तभी विकास संभव होगा।
जब प्रेमपूर्ण निर्मलता होती है, तब परमेश्वर की अनुभूति होने लगती है। प्रार्थना हृदय-पटल पर उपस्थित विक्षेप और आवरणों को दूर करती है—ऐसी प्रार्थना होनी चाहिए। प्रार्थना केवल की न जाए, बल्कि घटित हो; उसमें स्वाभाविक आविष्कार होना चाहिए, अन्यथा प्रभु का संकेत समझना कठिन है। परमेश्वर का आह्वान हमारे हृदय की पवित्रता के लिए ही है; अतः हृदय को निर्मल करना ही लक्ष्य होना चाहिए।
प्रार्थना के द्वारा विश्व के अणु-परमाणु में व्याप्त परमेश्वर के अस्तित्व के प्रति तथा सभी जीवों के प्रति करुणा जागृत होनी चाहिए। परमेश्वरीय अर्थ परमेश्वर की कृपा से प्रार्थना द्वारा ही प्राप्त होता है। प्रार्थना से सभी हृदयों का एकत्व संभव है। निकृष्ट मन को परिवर्तित कर उसे पवित्र और बलवान बनाने का कार्य प्रार्थना करती है। परमेश्वर को अपने मन में स्थिर करने तथा उसकी शक्ति को अपने भीतर जागृत करने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।
प्रार्थना करते समय मुझे जो आनंद प्राप्त होता है और जो अनुभव मैं करता हूँ, वही इस प्रार्थना के माध्यम से सबको प्राप्त हों—ऐसा श्रीगुरुदेव का मुझ पर आशीर्वाद है। इसलिए मैं विश्वासपूर्वक आश्वासन देता हूँ कि इस प्रार्थना के द्वारा प्रत्येक पारमार्थिक जीव, श्रीगुरु-प्रसाद से उच्चतम आनंद का स्वानुभव प्राप्त कर सकता है। निस्संदेह श्रीगुरु रूपी देवता, सबके प्राकट्य को गुरुत्व द्वारा उचित समय पर स्वीकार करती है। इसलिए यह प्रार्थना सर्वमंगलकारी है।
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अपने संपूर्ण जीवन में संत बाबामहाराज ने अनेक सुंदर प्रार्थनाएँ लिखीं। पू. बाबा की इस प्रार्थना को उनके अपने दिव्य वाणी में सुनें। भले ही आप शब्दों को न समझ सकें, उनकी वाणी आपको निःसंदेह मंत्रमुग्ध कर देगी।
पू. बाबा ने यह प्रार्थना ईश्वर के साथ संबंध स्थापित करने के लिए लिखी। उनकी ओंकार की वाणी है; इसलिए जब आप इसे सुनते हैं, तो नाद में आपको अपने ही सद्गुरु का प्रतिबिंब दिखाई देगा। यह प्रार्थना आपको भक्ति में मार्गदर्शन करेगी और आप किसी भी रूप में ईश्वर से अपना व्यक्तिगत संबंध विकसित कर सकेंगे।
प्रार्थना के संबंध में पू. बाबा के एक निर्देश में शिष्य के सामने ‘ॐ’ के प्रतीक का चित्र रखने का उल्लेख है। ‘ॐ’ पर उनका आग्रह इस बात को रेखांकित करता है कि सद्गुरु का स्वरूप सर्वव्यापी और सर्वोच्च है — रूप या संप्रदाय से परे। हमें आशा है कि इस प्रार्थना के माध्यम से आप अपने सद्गुरु का स्मरण कर सकेंगे।
॥ जय गुरुदेव ॥
