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पू. बाबामहाराज का गुळवणी महाराज के साथ दिव्य रिश्ता
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पू. बाबा के निर्वाण-काल से कुछ समय पूर्व उनके समकालीन संत पू. गुळवणी महाराज से सोलापुर में भेंट हुई थी। किंतु उस भेंट में पूरा समय दोनों के बीच केवल दृष्टि द्वारा ही संवाद होता रहा।

इसके पश्चात कुछ शिष्यों ने गुळवणी महाराज से पूछा—क्या हमारे बाबा इससे स्वस्थ हो पाएँगे? तब पू. गुळवणी महाराज ने कहा कि दत्तगुरु ने पू. बाबा पर एक अत्यंत महान कार्यभार सौंपा है, और उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया है। कोई चाहे कितना भी उन्हें रोकने का आग्रह करे, वे रुकने वाले नहीं हैं।

पू. गुळवणी महाराज ने पू. बाबा के निर्वाण के पश्चात भेजे गए संदेश में कहा—

“' चंद्रमे जे अलांछन । मार्तंड जे तापहीन ।'

श्री ज्ञानेश्वर द्वारा कथित इस संतत्व का श्री बाबा के भीतर नित्य जागरण रहता था। महाराष्ट्र-भूमंडल में एक नवीन धर्म-जागरण की प्रार्थना-प्रभात उनके द्वारा पूर्व दिशा की ओर अरुण-वर्णांकित शुभ-चिह्नों से मंडित होकर प्रकट हुई है। उनके दिव्यामृतधारा ग्रंथ में निहित अमृत-धाराओं के वर्षाव से, शताब्दियों-शताब्दियों तक श्रद्धाशील साधक-वर्ग स्नान करेगा और अपने-अपने देह-दोषों की सहज निवृत्ति करते हुए श्रीगुरु-चरणों की मधुर आरती साधेगा।

श्रद्धेय श्री बाबाओं की दिव्य स्मृति को मेरा अभिवादन!”

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