पू. बाबामहाराज का संत मायबाई के साथ दिव्य रिश्ता

पू. बाबामहाराज का जन्म वर्धा ज़िले के आर्वी ग्राम में श्रावण शुक्ल १४, शक १८४७ (३ अगस्त १९२५) के इस शुभ दिवस पर हुआ। आर्वी यह ग्राम संत मायबाई नामक पुण्यशील स्त्री-रत्न द्वारा दो सौ वर्ष पूर्व ही भगवान ज्ञानदेव के उज्ज्वल ज्ञान-प्रकाश से आलोकित कर दिया गया था। ज्ञानदेव की समाधि से गुरु-मंत्र प्राप्त करने वाले श्री हैबतीनाथ का ही कृपा-प्रसाद संत मायबाई को प्राप्त हुआ था। और तब इस ब्रह्मवादिनी मायबाई ने ज्ञानेश्वर के नाथ-पंथ की गौरवशाली ध्वजा अपने कंधे पर धारण कर समस्त विदर्भ को भक्ति-ज्ञान से जाग्रत किया।
इसी मायबाई के कृपा-आशीर्वाद से संत बाबामहाराज का जोशी कुल पावन हुआ था। ज्ञानेश-भक्ति की धारा बाबामहाराज के इस पवित्र कुल से निरंतर चार–पाँच पीढ़ियों तक प्रवाहित होती चली आई थी। जोशी घराने के पूर्वज केवल मायबाई की कृपा से ही वंश-वृद्धि और समृद्धि को प्राप्त हुए—ऐसा उल्लेख पू. मायबाई के चरित्र में मिलता है। मायबाई की परंपरा में पू. रमाबाई वैद्य के साथ जो संबंध था, उसे पू. बाबा ने उतनी ही उदात्त, धर्मशील कर्तव्यनिष्ठा के साथ बनाए रखा। पू. बाबा तो स्वयं को मायबाई का पुत्र ही कहा करते थे।
