पू. बाबामहाराज का स्वामी स्वरुपानंद के साथ दिव्य रिश्ता

आधुनिक काल में पू. बाबामहाराज के समकालीन, नाथ-संप्रदाय के महान संत—पावस के स्वामी स्वरूपानंद—यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से पू. बाबा से भेंट नहीं कर पाए, तथापि स्वामी स्वरूपानंद का पू. बाबा के साथ ऋणानुबंध था—यह बात स्वामी द्वारा “सांगाति” मासिक के अवसर पर पू. बाबा को भेजी गई लिखित शुभेच्छाओं से स्पष्ट होती है। स्वामी स्वरूपानंद लिखते हैं —
“स. न. वि. वि.—
आपका दि. ११–४–६८ का पत्र प्राप्त हुआ। आत्मचिंतन, नामसंकीर्तन, लेखन, प्रवचन आदि विविध साधनों के द्वारा समाज में सत्प्रवृत्तियों की वृद्धि करना—यही हमारा ईश्वर-नियोजित कार्य है। हम उसी का स्मरण रखते हुए उसे यथाशक्ति, यथामति पूर्ण करें।
आपके त्रैमासिक प्रकाशन के संकल्पित कार्य में आप सभी को सुयश प्राप्त हो—ऐसी प्रभु-चरणों में प्रार्थना करता हूँ।
आप सबका आत्मतृप्त,
स्वरूपानंद”
(मराठी से अनुवादित)
स्वामी स्वरूपानंद अपने शिष्यों से कहा करते थे कि “दिव्यामृतधारा” ग्रंथ को तब तक ध्यानपूर्वक पढ़ो, जब तक वह भली-भाँति समझ में न आ जाए; क्योंकि सम्पूर्ण नाथ-संप्रदाय का रहस्य संत बाबामहाराज आर्वीकर ने इसी दिव्य ग्रंथ में प्रकट किया है।
