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पू. बाबामहाराज का श्री तुकडोजी महाराज के साथ दिव्य रिश्ता
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पू. बाबामहाराज के शालेय शिक्षा-काल के दौरान आर्वी में श्री राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज परमहंस अवस्था में विचरण किया करते थे।

पू. बाबा के पिता का श्री तुकडोजी महाराज से स्नेह जड़ गया। वह स्नेह क्रमशः गाढ़ा होता गया। महाराज कभी-कभी उनके घर ठहरते भी थे और आते-जाते रहते थे। उस पवित्र पुरुष ने पू. बाबा को आकृष्ट कर लिया। एक बार पू. बाबा ने उनका खंजरी-भजन सुना—उस समय पू. बाबा की आयु लगभग दस वर्ष रही होगी। वे पूर्णतः मुग्ध हो गए। उनकी आँखों से अश्रु बहने लगे। देह और नेत्र जड़वत हो गए। भजन समाप्त होने पर एकत्रित समुदाय घर-घर लौट गया—यह बात पू. बाबा के ध्यान में ही नहीं आई। काफ़ी समय बीत जाने पर जब उनके पिता ने उन्हें पुकारा, तब भजन समाप्त हुए लगभग एक घंटे का समय हो चुका था। पिता से  पूछा—

“भाऊ” (घर में पिता को ‘भाऊ’ कहा जाता था), “भजन कब समाप्त हुआ?”

“अरे, चलो! काफ़ी समय हो गया है।”

तब पू. बाबा ने पूछा, “महाराज (तुकडोजी) कहाँ चले गए?”

“अरे, वे अपने पडाव की जगह चले गए।”

“भाऊ, क्या हम भी उनके पास चलें?”

यह प्रश्न सुनकर पिता प्रसन्न हुए, पर सहज ही बोले—

“अरे, अब रात के ग्यारह बज गए हैं। इस समय किसी के यहाँ जाया जाता है क्या!”

पू. बाबा शांत हो गए, पर उनके मन में यह उत्कंठा बनी रही कि कब महाराज से भेंट होगी, उनसे संवाद होगा, उनकी सेवा कर पाएँगे—यह अंतःआकर्षण पिता समझ गए। वे बोले—गए तो उस घर के लोगों को कष्ट होगा; नहीं तो हम अवश्य जाते। इस पर पू. बाबा बोले—

“भाऊ, उन्हें कोई कष्ट नहीं होगा। मैं छोटा हूँ। मैं उन्हें नमस्कार करूँगा, बात कह दूँगा, और पाँच मिनट में हम दर्शन लेकर लौट आएँगे। और मुझे लगता है वे लोग अभी जाग ही रहे होंगे—संत के सान्निध्य में नींद कैसे आएगी!”

पिता हर्षित हो उठे। पू. बाबा को साथ लेकर वे रात के ग्यारह बजे महाराज के पास चल पड़े। यही वह प्रथम प्रत्यक्ष भेंट का योग था—महाराज के सान्निध्य में भाव-भक्ति से प्रस्फुटित उस नन्हे पू. बाबा के कोमल मन का पहला दर्शन-योग।

पू. बाबा की राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज से पूर्वकाल में भी कुछ अवसरों पर भेंट हुई थी—ऐसी परंपरा में कहा जाता है। राष्ट्रसंत के एक शिष्य श्री मोहोड़ बताते हैं—

“मैं राष्ट्रसंत के साथ पंढरपुर गया था। वहाँ बाबा महाराज राष्ट्रसंत से मिलने आए थे। उस भेंट के समय मैं वहाँ उपस्थित था। वह दो संतों की भेंट थी—केवल पाँच–सात मिनट की! पर उसमें इतनाप्रेम , अपनत्व और परस्पर सम्मान था कि उस दर्शन से मैं अत्यंत अभिभूत हो गया, और बाबा की एक विशिष्ट छाप मेरे मन पर अंकित हो गई।”

कुछ वर्षों बाद, राष्ट्रसंत के देह-त्याग के पश्चात, पू. बाबा ने श्री मोहोड़ को माचणूर के उत्सव में आमंत्रित किया, उन पर अत्यधिक वात्सल्य और आत्मीयता प्रकट की, और उनसे कहा—

“तुम्हारे रूप में राष्ट्रसंत ही यहाँ उपस्थित हैं—यह मेरी दृढ़ धारणा है!”

इससे एक बात स्पष्ट होती है—संत, दूसरे संतों के प्रतिबिंब-रूप होते हैं; और वे उन संतों के शिष्यों में भी उसी महात्मा का दर्शन करते हैं।

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