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पू. बाबामहाराज का श्रीसमर्थ रामदासस्वामी के साथ दिव्य रिश्ता
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कुछ विलक्षण स्मृतियाँ पू. बाबा और श्रीसमर्थ रामदासस्वामी के आत्मीय बंधन के साक्ष प्रस्तुत करती हैं।​

 

लगभग १९५५ के आसपास, दासनवमी के अवसर पर, पू. बाबामहाराज सज्जनगढ़ गए थे। वहाँ उनके एक पार्षद पू. अनंतस्वामी से प्रथम भेंट—पू. बाबा द्वारा—पूर्व से ही नियोजित थी। उसी समय वहाँ दो अन्य शिष्यों से भी भेंट हुई। उन शिष्यों में से एक द्वारा कही गई वहाँ की एक घटना इस प्रकार है—

“सज्जनगढ़ पर समाधि-मंदिर के परिसर में सर्वत्र चौकोर, फरशी-जैसे पत्थर जड़े हुए हैं। पू. बाबा के पैरों में खड़ाऊँ थीं। चलते समय ‘टक-टक’ की ध्वनि वातावरण में भर जाती, जो संन्यास-धर्म की स्मृति को जाग्रत कर देती। पू. बाबा श्रीसमर्थ के समाधि-मंदिर की ओर बढ़े; मैं भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ा।

तलघर में श्रीसमर्थ की समाधि है, और समाधि के ऊपर छत में बने सुसज्जित गर्भगृह में श्रीराम-पंचायतन की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। समाधि-दर्शन के लिए तलघर में उतरना पड़ता है। प्रायः वहाँ घना अँधेरा रहता है—केवल प्रज्वलित समई और टँगे पंचज्योति-पात्र का जितना प्रकाश गिरे, उतना ही समाधि पर गिरता है।​

पू. बाबा अत्यंत गंभीर और विनम्र मुद्रा में तलघर में उतरे; मैं पीछे रहा। वे अकेले ही समाधि-मंदिर में झुक गए। मैं बाहर ध्यानपूर्वक खड़ा था। पू. बाबा ने समाधि पर अपना ललाट टेक दिया। सिर के काले-घने केश समाधि पर फैल गए—मानो मुख के चारों ओर केशों का मखमली आवरण बिछ गया हो।

दो मिनट बीते, पाँच मिनट बीते—पू. बाबा ने सिर नहीं उठाया। समाधि-मंडप में उपस्थित सभी लोग गंभीर, निस्पंद खड़े रहे। संत-गृह में दर्शन लेने की यह अनोखी रीति आज सभी देख रहे थे। किसी प्रकार की हलचल नहीं—कैसा यह दर्शन! देह की गति मानो शिथिल हो गई थी; वाणी मौन हो गई थी—केवल निःशब्द भेंट!

पंद्रह–बीस मिनटों के बाद पू. बाबा ने सिर उठाया। नेत्र कृतार्थता से तृप्त थे, और मुख संत-दर्शन के आनंद से दीप्त। उपस्थित जनों को संत-दर्शन कैसे करना चाहिए—इसका सजीव पाठ मिल गया।

मुझे देखकर पू. बाबा बोले—‘कितनी पावन है न, यह भूमि! यहाँ का कण-कण श्रीसमर्थ के ब्रह्मतेज से कैसे नहाया हुआ है! चलो, स्नान करने।’

इतना कहकर वे उठे। उनके साथ मैं और एक अन्य त्यागी, सात्त्विक साधक—जो सज्जनगढ़ पर उपासना के लिए ठहरे थे—भी चले। पू. बाबा तालाब की ओर बढ़े। उन्होंने अपने वस्त्र उतारे और अक्षरशः उस भूमि में लोटने लगे। वे बोले—‘इस पवित्र धूल से हमारा देह अवश्य रँगा होना चाहिए! उस अतुल सामर्थ्यशाली महापुरुष ने अपनी समस्त तपस्या “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” में अर्पित की—इसीलिए आज इस महाराष्ट्र-भूमि में हम महाराष्ट्रीय होने का गर्व धारण करते हैं। उनका ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता।’

धूल-स्नान के बाद उन्होंने तालाब में छलाँग लगाई। तैराकी में उनका अच्छा अभ्यास प्रतीत हुआ। वे जल में डुबकी लगाकर तल का कीचड़ घाट की सीढ़ियों पर जमा करते और उसे सिर से पाँव तक अपने शरीर पर मल लेते। श्रीसमर्थ के प्रति उनके अंतःकरण में वास करने वाला निष्कपट, अकृत्रिम आदर इस प्रकार व्यक्त हो रहा था—और साथ ही, संत-भूमि और संत-स्थान में साधक को कैसे विहरना चाहिए, इसका पाठ भी हम जैसे लोगों को मिल रहा था।

‘जय जय रघुवीर समर्थ!’—ऐसी गर्जना करते हुए पू. बाबा तालाब से बाहर आए।”

 

यद्यपि परमेश्वर विविध रूपों में प्रकट होता है, तथापि उसका तत्त्व अपरिवर्तित ही रहता है। इसलिए संत बाबामहाराज का श्रीसमर्थ रामदासस्वामी के साथ दिव्य संवाद होना आश्चर्य का विषय नहीं—परंतु हम जैसे सामान्य जनों के लिए ऐसे अनुभवों की अद्भुतता मन को अभिभूत कर देती है।

 

यह घटना पू. बाबा के अंतिम वर्षों की है। उन दिनों पू. बाबा और कुछ चयनित साधक दिव्यामृतधारा ग्रंथ के लेखन-कार्य में संलग्न थे। इनमें उनके अंतरंग शिष्य पू. माधवस्वामी भी सम्मिलित थे।

एक दिन प्रातःकाल पू. माधवस्वामी को पू. बाबा की पुकार सुनाई दी—“माधवा, माधवा…”। वे तुरंत सामने आए और नमस्कार किया। तब पू. बाबा बोले—“अभी-अभी समर्थ रामदास आए थे। नगर ज़िले में उनके द्वारा स्थापित गोमयीन हनुमान-मूर्ति और उस मंदिर की देखभाल तथा नए निर्माण की ज़िम्मेदारी उन्होंने हमें सौंपी है। मुझे यह कार्य संभव नहीं, पर मेरा माधव यह करेगा—ऐसा वचन मैंने उन्हें दिया है।”

इस प्रकार, अन्य सभी कार्य एक ओर रखकर इसी कार्य में प्रवृत्त होने की गुरु-आज्ञा पू. बाबा ने माधवस्वामी को दी। इसके बाद, पू. बाबा की आज्ञा से जब पू. माधवस्वामी नगर ज़िले में श्रीक्षेत्र हनुमान टाकळी का अन्वेषण करने निकले, तो ग्राम-सीमा पर ही उन्हें श्रीसमर्थ रामदास और हनुमंत के दर्शन हुए। आगे चलकर वही स्थान उनका कार्यक्षेत्र बना।

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