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पू. बाबामहाराज का श्री स्वामी समर्थ के साथ दिव्य रिश्ता
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“अनंत कोटि ब्रह्मांडनायक” यह उपाधि श्री अक्कलकोट स्वामीं को प्राप्त है। जिनकी सत्ता काल से परे और आकाश से भी परे पहुँचती है, वे प्रत्येक जीव से संबद्ध रहते हैं। इसलिए पूज्य बाबामहाराज से उनका संबंध होना कोई आश्चर्य की बात नहीं। किंतु यह संबंध कब और कैसे प्रकट हुआ—इसका अन्वेषण करना मनोहर होगा।

बाबामहाराज और स्वामी के बीच का नाता अत्यंत आत्मीय था—इतना कि स्वामी का अस्तित्व मानो स्वयं बाबामहाराज में ही प्रकट होता रहता था। ऐसे अनेक स्मरण आज भी भक्तों के अधरों पर जीवित हैं।

जब बाबामहाराज पहली बार अक्कलकोट गए, तब उनके चरण वट-वृक्ष के मठ में पड़े। वहीं की बरामदा में उन्होंने निवास किया। इसी पवित्र स्थान पर, स्वामी की साक्षी में, संभवतः उनका प्रथम प्रवचन हुआ। यद्यपि यह एक आरंभिक प्रसंग था, पर इसके बाद स्वामी के साथ उनका संबंध विभिन्न अवसरों से निरंतर प्रकट होता रहा।

कुछ वर्षों बाद, दादर की डी. एल. वैद्य रोड स्थित मठ में बाबामहाराज का प्रवचन चल रहा था। उसी समय एक भक्त ने स्वामी की प्रतिमा की ओर देखकर कहा, “स्वामी की मुद्रा कितनी उग्र दिखाई देती है!” इस पर बाबामहाराज ने तत्क्षण सुधार किया—“उग्र? यह क्या कह रहे हो? ठीक से देखो—इस दृष्टि में अपार करुणा है!” उस दिन के बाद उस भक्त को उस प्रतिमा में केवल स्वामी की अनंत कृपा और वात्सल्य ही अनुभव होने लगा।

१९५५ में बाबामहाराज पहली बार माचणूर आए। यह आगमन सहज नहीं था, बल्कि स्वामी की इच्छा के अनुसार घटित हुआ था। औरंगज़ेब के काल की चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित भवानीमाता के एक छोटे से मंदिर में उनके चरण पहुँचे। दो फुट ऊँचे द्वार वाला यह छोटा सा (चार बाय चार फुट) मंदिर वही स्थान है जहाँ कुछ वर्षों तक स्वामी ने वास किया था। आज भी इसी परिसर के श्री सिद्धेश्वर मंदिर में स्वामी द्वारा स्थापित पत्थर की पादुकाएँ दर्शनार्थ उपलब्ध हैं। माचणूर के भक्त बताते हैं कि भवानीमाता का यह मंदिर भी स्वामी ने ही स्थापित किया था, और स्वामी की आज्ञा से ही बाबामहाराज यहाँ स्थिर हुए।

१९७१ में चातुर्मास के समय, जब बाबामहाराज माचणूर में थे, वे अत्यंत अस्वस्थ थे। उसी समय अक्कलकोट के एक भक्त के मन में सहसा यह विचार कौंध गया—“क्या बाबामहाराज ही स्वामी के अवतार हैं?” आश्चर्यजनक रूप से, उसी क्षण बाबामहाराज अचानक ठहर गए, कमर पर हाथ रखकर स्वामी की परिचित मुद्रा में खड़े हुए और बोले, “अरे! संशय किस बात का? देखो—मैं ही स्वामी हूँ!” उस भक्त को उसी क्षण स्वामी के दर्शन हुए और उसका समस्त संशय दूर हो गया।

ऐसे अनेक प्रसंगों से यह दैवी नाता बार-बार प्रकट होता रहा। माचणूर की गुरुदेव कुटीर में—जहाँ पहले तुलसी-वृंदावन था—एक साधक को अद्भुत दृष्टांत हुआ। ध्यानावस्थित अवस्था में उसने पहले तुलसी-वृंदावन से टेक लगाए बैठे श्री स्वामी को देखा। वह नमस्कार करने ही वाला था कि सामने का दृश्य बदल गया—अब उसी स्थान पर पूज्य बाबामहाराज विराजमान थे। कुछ ही क्षणों में दृश्य बार-बार बदलता रहा—कभी स्वामी, तो कभी बाबामहाराज। उस दिन उस भक्त को उनके अद्वैत का स्पष्ट दर्शन हुआ।

बाबामहाराज स्वयं भी इस अद्वैत-भाव को स्वीकार करते थे। माचणूर में रहते हुए वे मठ की ज़िम्मेदारी प्रायः पू. माधवस्वामी को सौंपते थे। एक बार मुंबई के लिए प्रस्थान से पूर्व उन्होंने माधवस्वामी से कहा, “माधवा, मठ की ठीक तरह से देखभाल करना। कोई कठिनाई आए, तो स्वामी से कहना।”

कुछ दिनों बाद संध्या के समय माधवस्वामी नदी-स्नान के लिए निकलने वाले थे। प्रतिदिन आने वाला एक विशिष्ट भक्त उस दिन नहीं आया था, इसलिए दीप प्रज्वलन और संध्याकालीन साधना में विलंब हो जाएगा—ऐसी चिंता उन्हें होने लगी। तभी उन्हें बाबामहाराज के शब्द स्मरण हुए | वे गुरुदेव कुटीर में गए, स्वामी की प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर बोले, “स्वामी, ज़रा ध्यान रखना। मैं शीघ्र लौटता हूँ।”

स्नान पूरा कर वे शीघ्रता से लौटे। मठ के पार पर उन्होंने एक वृद्ध पुरुष को बैठे देखा। दीप जलाकर उनसे बात करूँ—यह सोचकर माधवस्वामी भीतर चले गए। किंतु कुछ ही क्षणों बाद जब वे बाहर आए, तो वह वृद्ध कहीं दिखाई नहीं दिया। उन्होंने पूरे मठ में खोज की, पर वह कहीं नहीं मिला।

कुछ दिनों बाद बाबामहाराज लौटे। उनके साथ कुछ साधक भी थे। एक संध्या सभी बैठे थे, तभी बाबामहाराज अचानक बोले, “हमारे माधवा ने स्वामी को काम बता दिया!” माधवस्वामी विस्मित होकर बोले, “मैंने स्वामी से कहा?”

बाबामहाराज हँसते हुए बोले, “हाँ! स्वामी ने मुझे मुंबई में कहा—‘माधव ने मुझे मठ की रखवाली के लिए पार पर बैठा दिया!’”

उस क्षण माधवस्वामी को साक्षात्कार हुआ—उस रात दिखाई देने वाला वह वृद्ध पुरुष और कोई नहीं, स्वयं अनंत कोटि ब्रह्मांडनायक श्री स्वामी महाराज ही थे!

पू. बाबा की साधना-संहिता ग्रंथ की सांगता के अंतिम दिन घटी घटना इस प्रकार है—दीवार पर अक्कलकोट स्वामी का एक चित्र लगा था, जिस पर हार अर्पित था। उसी चित्र के नीचे पू. बाबा बैठे थे। उन्होंने अंतिम ओवी पूर्ण की और किसी चलचित्र या नाटक के ‘क्लायमैक्स’ दृश्य की भाँति, अक्कलकोट स्वामी के चित्र पर चढ़ाया हुआ हार सहजता से पू. बाबा के गले में आकर विराजमान हो गया। उस महाप्रसाद से पू. बाबा भाव-विभोर हो उठे।

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