स्वात्मदीक्षा
धार्मिक* आचारों की दुनिया में प्रवेश करने से पहले अंतःकरण में परमार्थ-विचारों का जागरण होना आवश्यक है। जीवन धर्ममय होने के लिए परमार्थ के मंदिर का विशाल निनाद करने वाला तत्त्व-स्वर प्रत्येक भावुक साधक को पहले ध्यान में ग्रहण करना उचित है। यदि ऐसा न हुआ, तो संभव है कि आप पुनः यह परंपरागत भूल कर बैठें कि “केवल आचार-निष्ठा का संकुचित स्तवन ही धर्म है।” इसलिए अध्यात्म-विवेक से अपने अंतरंग को जागृत करें और फिर आगे के आचरण से संपूर्ण जीवन को विशाल और पावन बनाएं। इसी उद्देश्य से ‘स्वात्मदीक्षा’ का यह प्रयोग है।
(प. पू. बाबामहाराज आर्वीकर की ‘आचार संहिता’ से)
*पू. बाबा कहते हैं, “धर्म एक जीवन-विज्ञान है। स्थिर-चर के संबंध में होना, रहना और आचरण करना — इसी की व्यवस्था धर्म बताता है। मानवीय सृष्टि और मानवेतर जीवन-रचना की उत्क्रांति का विचार धर्म में निहित है। यही संतधर्म, ईशधर्म अथवा आत्मधर्म है।”
(मराठी से अनुवादित)
प्रयोग प्रक्रिया
साधक को प्रतिदिन प्रातः स्नान के पश्चात ‘स्वात्मदीक्षा’ का प्रयोग करना चाहिए, जो स्वात्मो पदेश के स्वरूप का है।
1
प्रातः स्नान के बाद आसन पर कुछ समय शांत भाव से बैठें।
2
तत्पश्चात नामस्मरण प्रारंभ करें।
3
थोड़ी देर बाद केवल यह भाव रखें कि नामस्मरण चल रहा है और नामस्मरण करना बंद कर दें। इस भाव से स्मरण का भूतसंस्कार जागृत होगा और भीतर ही स्मरण हो रहा है ऐसा अनुभव होगा।
4
फिर उस स्मरण को केवल सुनते रहें।
5
जब वह स्पष्ट होने लगे, तब जो स्मरण घटित हो रहा है, वह कहाँ हो रहा है और कौन कर रहा है—इसका स्मरण की गति के साथ शांत होकर अनुसंधान करें।
ऐसा होना कठिन नहीं है। उलटे यह अत्यंत सहज है। जैसे ही आप ऐसा खोजने लगेंगे, आपको श्वास की गति मंद होने का अनुभव होगा। आगे ध्यानस्थिति आएगी, वृत्ति का लय होगा और स्थूल देह की विस्मृति होगी, किंतु आप स्वयं जागृत रहेंगे। इसी समय बुद्धि और मन अत्यंत निकट और एकसंवेद्य होते हैं। ऐसे समय वहाँ निम्नलिखित विचार-स्पंद जागृत करें।
(१) हे प्रभो! मेरा सर्वस्व सुख है। मैं आनंदपूर्ण हूँ।
(२) हे प्रभो! मुझे सब ही हितकारी और मित्रभाव वाले हैं।
(३) हे प्रभो! किसी के भी संबंध में निंदात्मक भाषण मुझसे न हो।
(४) हे प्रभो! सबके प्रति मुझे प्रेम और निष्कपट मन प्रदान करो।
(५) हे प्रभो! सर्वत्र तेरे ही स्वरूप का उत्सव मेरी आँखें देखें।
(६) हे दयाघन! प्रत्येक स्पर्श में तेरा ही मधुर स्पर्श मुझे प्राप्त हो।
(७) हे नियंता! मेरी इंद्रियाँ तेरे पवित्र संग से पुनीत हों।
(८) हे दिव्यधन! मेरी बुद्धि में तेरा ही सुखमय स्मरण बना रहे।
(९) हे पुराणपुरुष! तेरी कृपा से मेरा प्रत्येक कर्म सबका हित करे।
(१०) हे जनार्दना! मेरा प्रत्येक क्षण तेरे प्रेम से शुद्ध, उपकारक होकर सत्य संकल्प में क्रियाशील रहे।
(११) हे वरदानी जगदात्मा! समस्त विश्व आनंदी, मंगलमय और उर्ध्वगामी बना रहे। इतना इस याचक को वरदान दो।
उपरी शुद्धतम विचार-स्पंदों से उस क्षण बुद्धि को चेतित करें। तब कुछ ही दिनों में आपका संकल्प सिद्ध होकर दिव्यता और शांति प्राप्त होने का आनंद आप अनुभव करेंगे। क्योंकि उसी समय बुद्धि अपनी मूल शक्ति में प्रतिष्ठित होती है, जिससे उस समय दिए गए इस उपदेश से स्वभाव का निर्माण होता है। इसी को ‘स्वात्मदीक्षा’ विधि कहते हैं।
